श्रीकृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र में अर्जुन को दिया कर्मयोग का ज्ञान ही गीता कहलाता है। गीता महाभारत के भीष्मपर्व का एक उपपर्व है। जिसमें श्रीकृष्ण ने बताया है कि मनुष्य को सुख और दुख के समय में क्या करना चाहिए। श्रीकृष्ण के अनुसार सुख के समय में मनुष्य को खास व्यवहार करना चाहिए। सुख के समय कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। सुख और दुख में हम कई बार मन को काबू में नहीं रख पाते हैं। जिससे हमारे मुख से कुछ ऐसे शब्द या हमारे हाथों कुछ ऐसा हो जाता है जिससे बाद में हमारा ही नुकसान हो जाता है। इसलिए इन दो स्थितियों में समझदारी से काम लेना चाहिए। अपने मन और दिमाग को शान्त रखने का प्रयास करना चाहिए ताकि हमें  स्वयं के द्वारा ही कहे गए शब्दों या किये गए कर्मों से बाद में पछताना या किसी भी  प्रकार की विपत्ति में न फंसना पड़े।

महाभारत में भीष्म पर्व का श्लोक

न प्रह्दष्येत प्रियं प्राप्त नोद्विजेत् प्राप्य चाप्रियम्।

स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः।।

 

 सुख की स्थिति में 

इस श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब भी कोई व्यक्ति बहुत खुश होता है, तब वह अपने मन को वश में नहीं रखता, बल्कि खुद उसके वश में हो जाता है। अच्छे दिनों में कई बार हम ऐसी कुछ बातें कह जाते हैं, जो भविष्य में हमारे लिए पूरा कर पाना संभव न हो या ऐसा कुछ कर जाते हैं, जिसके बुरे परिणाम हमें भविष्य में झेलना पड़ सकते हैं। ये बात हमेशा ध्यान रखनी चाहिए कि अच्छे दिन हर समय नहीं रहते, इसलिए सुख के समय अपने मन को अपने वश में रखें। साथ ही अपने शब्दों और कार्यों का चयन सोच-समझ कर करें।

 दुख की स्थिति में 

कई लोग अपने बुरे समय से अपना धैर्य खो देते हैं और अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए ऐसे काम करने लगते हैं, जो उन्हें कभी नहीं करना चाहिए। दुख ही एक ऐसा समय होता है, जब भी मनुष्य आसानी से गलत रास्ते पर चलने को मजबूर हो जाता है। हमें ये बात समझनी चाहिए कि कैसा भी समय हो, वह हमेशा नहीं टिकता। अगर अपने बुरे समय में समझदारी से काम लें और किसी भी रूप में अधर्म न करें तो जल्द ही अच्छा समय भी आ जाता है। दुख और परेशानी में हमें मन को वश में रखकर सूझ-बूझ के साथ काम करना चाहिए। धैर्य से काम करना चाहिए।

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