सनातन धर्म से संबंधित पौराणिक इतिहास विभिन्न कथाओं, रहस्यमयी चरित्रों और चमत्कारों का संग्रह है। इसे विश्व के सबसे प्राचीन धर्मों में से एक माना जाता है इस आधार पर यह भी जाहिर है कि इसमें मौजूद कथा-चरित्रों की संख्या भी अपेक्षाकृत अधिक होगी।

हम और आप शायद अपने स्कूल के दिनों से ही कुछ ऐसी जगहों, जिसमें विभिन्न मंदिर, तेर्थ स्थल आदि शामिल हैं, के विषय में सुनते आए हैं जो किसी ना किसी देवी देवता से संबंध रखती है और जिसे बेहद चमत्कारी माना जाता है।

आज हम ऐसे ही अन्य बेहद महत्वपूर्ण मंदिर से जुड़ी पौराणिक कहानी आपको सुनाने जा रहे हैं जो इसे हिन्दू धर्म से जुड़े लोगों की आस्था का केन्द्र बनाती है।

झारखंड की राजधानी रांची से करीब 80 किलोमीटर दूरी पर मां छिन्नमस्तिका का बेहद लोकप्रिय मंदिर स्थित है, जो कामाख्या मंदिर के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा शक्ति पीठ है। यह मंदिर ना सिर्फ अपने पौरणिक महत्व के लिए जाना जाता है बल्कि देवी छिन्नमस्तिका के गले में से निकलने वाली रक्त की धार भी इसे बेहद रहस्यमय बनाती है जो निरंतर रूप से दो भागों में विभाजित होकर बहती रहती है।

छिन्नमस्तिका का यह विश्व विख्यात मंदिर रजरप्पा (रांची) की दामोदर और भैरवी नदी के संगम तट पर स्थित है। तो चलिए जानते हैं क्या है इस मंदिर ज्की देवी छिन्नमस्तिका से संबंधित पौराणिक कहानी।

पुराणों के अनुसार एक बार मां भगवती अपनी दो सहेलियों के साथ मंदाकिनी नदी में स्नान करने के लिए गई थीं। स्नान करने के पश्चात उनकी सहेलियों को बहुत भूख लगी जिसकी वजह से उनका पूरा शरीर काला पड़ने लगा था। उनकी सहेलियों ने उनसे कुछ खाने को मांगा लेकिन उस समय कुछ भी उपलब्ध नहीं था। देवी ने उन्हें कुछ प्रतीक्षा करने के लिए कहा लेकिन वह बार-बार भूख लगने की बात करती रहीं।

उनकी सहेलियों ने भावुक होकर कहा, तुम तो मां हो और मां तो अपनी संतान की भूखशांत करती है। अपनी सखियों की ये बात सुनकर मां भगवती ने खड़ग से अपना सिर काट दिया, उसमें से रक्त की तीन धाराएं निकली। उन में से दो धाराओं का पान उनकी सहेलियों ने किया और तीसरी धारा से वे खुद पान करने लगीं। तभी से उन्हें छिन्नमस्तिका देवी के नाम से पूजा जाने लगा।

जिस तरह असम में कामाख्या मंदिर विभिन्न तांत्रिक क्रियाओं का गढ़ हैं, उसी तरह रांची का यह छिन्नमस्तिका मंदिर भी तंत्र विद्या के जिज्ञासुओं के बीच बहुत प्रसिद्ध है।

इस मंदिर में बकरे की बलि दिए जाने का विधान है, बकरे का सिर पुजारी ले जाता है और धड़ भक्त को वापस दे दिया जाता है। सबसे ज्यादा आश्चर्य की बात यह है कि जिस जगह बकरे का रक्त गिरता है वहां एक भी मक्खी नहीं आती।

देवी छिन्नमस्तिका मंदिर के अलावा यहां महाकाली मंदिर, सूर्य मंदिर, दस महाविद्या मंदिर, बाबाधाम मंदिर, बजरंग बली मंदिर, शंकर मंदिर और विराट रूप मंदिर नाम से करीब 7 अन्य मंदिर भी हैं जो विभिन्न मान्यताओं के आधार पर श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र हैं।

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